पृष्ठभूमि

मध्यप्रदेश जैव विवधता एवं परम्परागत ज्ञान के क्षेत्र में अत्यंत समृद्ध है। यह देश का सर्वाधिक वन क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के बाहुल्य वाला प्रदेश है। इन विशेषताओं के चलते प्रदेश की समृद्ध जैव सम्पदा के साथ प्रदेश जनजातीय मूलक एवं देशज ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी है। प्रदेश के परम्परागत ज्ञान का विशेष रुप से स्वास्थ्य, कृषि, जल प्रबंधन, पर्यावरण एवं वानकी इत्यादि क्षेत्रों में विशेष महत्व है। विश्व व्यापार संगठन की मुक्त व्यापार संबधी अनुशसाएं हमारे देश पर भी लागू होती है, ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो गया है, कि न केवल हम अपने परम्परागत ज्ञान का संरक्षण करें बल्कि इस परम्परागत ज्ञान का प्रौधोगिकी विकास, नये रोजगारों के सृजन एवं औद्योगिकरण के क्षेत्र में उपयोग किया जावे। इसके लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि इस ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर कसते हुए इसका वैज्ञानिक सत्यापन करते हुए व्यवस्थित प्रलेखन किया जाय, इससे हमारे इस देशज ज्ञान को मान्यता मिलेगी एवं इससे प्राप्त लाभ से संबंधित व्यक्ति या समुदाय की भी सहभागिता होगी। इस योजना के क्रियान्वयन से मुख्य रुप से ग्रामीण एवं आदिवासी जन समुदाय लाभान्वित होगा ओर इसके साथ-साथ नए-नए उत्पाद एवं प्रक्रिया का भी विकास होगा इस ज्ञान के प्रलेखीकरण एवं सत्यापन से बायोपायरेसी (जैव ज्ञान की चोरी) को भी रोका जा सकेगा तथा अवांछित पेटेट पर देश विदेश में रोक लगाई जा सकेगी।

इसके साथ-साथ म.प्र.शासन एवं परिषद् द्वारा ग्रामीण अन्वेशणों को पुरस्कृत करने एवं ऐसी गतिविधियों को अन्य माध्यम से भी प्रोत्साहित करने का निर्णय किया गया है। यह पाया गया है कि आधुनिक विज्ञान की नई विधाओं जैसे सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, नैनो टेक्नोलॉजी इत्यादि विषयों की मूल विषयवस्तु केवल अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं में ही उपलब्ध है एवं इसका लाभ ग्रास रुट लेवल अथवा कस्बों एवं ग्रामीण परिवेश के लोगों को नही मिल पाता। इसकी वजह से विज्ञान के इन अग्रणी क्षेत्रों में ना ही उनकी जानकारी बढ़ पाती है और ना ही वे इस विषय पर कुछ कार्य कर सकते हैं। तात्पर्य यह है कि जब तक विषय को अच्छी तरह या सहज रूप से ना समझा जाये तब तक ये कार्य नही किया जा सकता है और आधुनिक विज्ञान की महत्वपूर्ण विधाओं को हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में अनुसृजन करने की योजना परिषद द्वारा शुरू की गई है। इस योजना के अतंर्गत प्रदेश में उपलब्ध ऐसे ज्ञान की विषय वस्तु जिसे विधिवत लिपिबद्व अथवा व्यवस्थित नही किया जा सका है उसका प्रलेखन किया जावेगा जिससे बौद्धिक संपदा के संरक्षण के साथ साथ अक्षय विकास हेतु इसका दोहन किया जा सके।

उद्देश्य

विभिन्न भाषा में उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य का अनुसृजन कर सुलभ रूप से समझाी जा सकने वाली भाषा एवं श्रृव्य माध्यम से आमजन को उपलब्ध कराना।

  1. ग्रामीण परम्परागत जानकारी को हिन्दी एवं अंग्रेजी में आवष्यकतानुसार प्रलेखित कर सुरक्षित करना।
  2. बौद्धिक संपदा संरक्षण सुनिष्चित करना।
  3. ग्रामीण अन्वेषणों को प्रोत्साहित करने हेतु उनके अन्वेशणों को प्रालेखित करते हुये उपयोग में लिया जाना।
  4. परम्परागत/देषज ज्ञान का सत्यापन एवं अनुप्रयोग।
  5. संस्थाओं/संस्थानों के परस्पर समन्वयन कर उनकी स्वयं की कार्यक्षमता एवं दक्षता का विकास करना।
  6. परम्परागत ज्ञान की वैज्ञानिक मान्यता स्थापित करना।
  7. परम्परागत ज्ञान का उचित उपयोग तथा उससे औद्योगिकीकरण को प्रोत्साहित करना।
  8. समाज एवं जन साधारण की आंचलिक व क्षेत्रीय समस्याओं को परम्परागत ज्ञान द्वारा हल करना।
  9. प्रदेश में उपलब्ध संसाधनों एवं सुविधाओं को जोड कर अनुसंधानात्मक गतिविधियों को दिशा एवं गति प्रदान करना व परिणाम सूचक परियोजनाएं क्रियान्वित करना।
  10. परम्परागत ज्ञान के उपयोग से प्राप्त लाभ में पराम्परागत ज्ञान धारक को सहभागिता सुनिश्चित करना।
  11. परम्परागत ज्ञान धारक की बौद्धिक क्षमता संरक्षित करना।